भला किनारों पर कहां कोई देर तक ठहरता है...

मोहब्बतों के सारे खत वो नफरतों से जला गया,
उसे जाना था आखिर वो चला गया।
ना कोई गिला, ना शिकवा बस आंखों की पुतलियों में वो आंसूओं सा तैरता है,
भला किनारों पर कहां कोई देर तक ठहरता है।।
विनोद विद्रोही

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