मैं कवि वीररस का...

कवि वीर रस का:
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मैं ठहरा कवि वीररस का,
ये श्रॄंगार, प्रेम लिखना कहां
मेरे बस का।

मैं तो देश के माथे पे जख़्मों की
कहानी लिखता हूं।
मां भारती की पीड़ा और आंखों
का पानी लिखता हूं।

सरहद का सैनिक तो नहीं, लेकिन
कलम का सिपाही हूं।
वतन के नाम मैं अपनी सारी,
सारी ज़िन्दगानी लिखता हूं।।

मां भारती की पीड़ा और आंखों
का पानी लिखता हूं।

मुझसे तुम बात करो मुल्क के जयकारे
और वंदे मातरम के जस का।
मैं ठहरा कवि वीररस का,
ये श्रॄंगार, प्रेम लिखना कहां
मेरे बस का।।

विनोद विद्रोही
नागपुर(7276969415)

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