कुछ नया लिखो।

नया  लिखो:
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यूं ही सोच रहा था, आज क्या लिखो।
कलम ने कहा कुछ नया लिखो।
बात सुनकर कलम की सोच मेरी सकपकाई,
और खुद पे ही हंसी आयी।
फिर दिल ने कहा हर तरफ वही कहानी,
वही दर्द तो बयां होता है।
कैसे लिखूं, कुछ भी तो नहीं नया होता है।।

क्या फर्क पड़ता इसकी या उसकी सरकार है।
भूख, गरीबी, हत्या, बलात्कार हर तरफ मेरे यार है।
आतंकवाद से लड़ने में भी हम फेल रहे हैं।
कभी कम तो कभी ज्यादा हम झेल रहे हैं।।

भूलकर ये सब आगे कैसे मैं बढ़ जाऊँ,
बिना नये के नया कैसे लिख पाऊँ।
कैसे कहूं कितनी पीड़ा ह्रदय में छुपाये बैठा हूं,
एक नये भारत की आस मैं तो कब से लगाये बैठा हूं।।

विनोद विद्रोही
नागपुर

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