अरे कोई तो समझाए इन मतिमंदों को, दे रहे समर्थन आतंकी खूनी दरिंदों को। सब्र का इम्तिहान लेते तोड़ रहे अनुबंधों को देश कभी माफ नहीं करेगा ऐसे जयचंदों को। भला कौन रोक पाया है आसमानी परिंदों को, जकड़ लो गर्दन खींच दो अब इन फंदों को। लगा दो आग, फूंक दो इन दिखावी संबंधों को, देश कभी माफ नहीं करेगा ऐसे जयचंदों को। सब जानते हैं, तुम्हारे गोरखधंधों को, स्वार्थ की रोटी सेकते, झूठ के पुलिंदों को। अब रोक ना पाओगे जज्बाती बुलंदों को, लहर रहा है तिरंगा, बजने दो मां भारती के छंदों को, देश कभी माफ नहीं करेगा ऐसे जयचंदों को। विनोद यादव
दोस्तों कल चेन्नई में इंग्लैंड के खिलाफ चौथे दिन का खेल देखकर जीवन का भी खेल समझ में आया। जीवन भी कुछ ऐसा ही है, कब इसका पासा पलट जाए कहा नहीं जा सकता है। साथ ही करुण नायर की बैटिंग देखकर अभिनेता रणबीर सिंह की एड में रॉयल स्टैग की टैग लाइन याद भी आई, "इट्स योर लाइफ मेक इट लार्ज"। दोस्तों करुण नायर की चौथे दिन के खेल की बैटिंग से बहुत कुछ सीखा जा सकता है। सोचिए कल जब सुबह के सत्र में करुण बैटिंग करने उतरे थे तब वो क्या थे और शाम होते-होते क्या बन गए। कल सुबह तक जिस करुण को भारत में भी कुछ क्रिकेट प्रेमी ही शायद जानते थे, शाम होते-होते पूरा विश्व करुण नायर से रुबरू हो चुका था। इसे ही कहते हैं जिंदगी, जब ये मेहरबान होती है तो स्टार बनते देर नहीं लगती है। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में इंसान की लगन, मेहनत और सबसे अहम भाग्य की भी बड़ी भूमिका होती है। क्योंकि भाग्य भी उनका ही साथ देता है जिनमें कुछ करने का जज्बा होता है, कुछ कर गुजरने की चाह होती है। दोस्तों यहां करुण नायर की बात करके ये समझाना चाहता हूं, व्यक्ति का जीवन भी कुछ ऐसा ही है, कब इसमें तब्दीली आ जाए कहा नहीं जा सकता ...
जवानों की शहादत पर कैसे चुप रहा जाऊं मैं, मैं दिल्ली नहीं सबकुछ जान के भी मौन हो जाऊं मैं। बनकर चट्टान दुश्मानों से मैं टकरा जाऊंगा, सीने पर जख्म देने वालों को मौत की नींद सुलाऊंगा। दे दो बंदूक अब मेरे हाथों में मैं जाऊंगा लड़ने को, भारत मां का मान बचाने मैं तैयार हूं मरने को। दिल्ली तेरे हाथों में वक्त चूंड़ियां पहनाएगा, तेरी कायरता पर इतिहास का सर शर्म से झुक जाएगा। सीमा पर खून बहे और दिल्ली तू मौन रहे, ऐसे में तू ही बता असली अपराधी कौन रहे। बुजदिलों के हाथ कांपते हैं कुछ भी करने को, भारत मां का मान बचाने मैं तैयार हूं मरने को। दुर्योधन तबाही मचा रहा कश्मीरी क्यारों में। कृष्ण की नीतियां फेल हो रही इन बारूदी बौछारों में। अर्जुन का गांडिव अचेत पड़ा है, लाशों के अम्बारों में, भीम बेचारा लाचार खड़ा है सीमा के गलियारों में। लेकिन समंदर को आंख दिखाते, समझा दो इन झरनों को, भारत मां का मान बचाने मैं तैयार हूं मरने को, दे दो बंदूक अब मेरे हाथों में मैं जाऊंगा लड़ने को। विनोद विद्रोही
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