कहां गुम हो गयीं वो संवेदनायें वो सिसकियां?

वो सुबह से डाकिये की राह तकते हुये कितने चौकन्ने रहते थे।
हो भी क्यों ना, उसके हाथों में ही तो दर्द और खुशियों के पन्ने रहते थे।
अब तो ना रहा वो डाकिया ना रहीं वो चिट्ठियां,
फ़ेसबुक, वट्स एप के इस दौर में जाने कहां गुम गयीं वो संवेदनायें वो सिसकियां।।
विनोद विद्रोही

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