इंसान खुद यहां भगवान बन बैठे!

ये अंध नतमस्तकी है,
श्रद्धा से दिया कोई तोहफ़ा नहीं है।
और ये कानून की कुर्सी है,
तुम्हारे घर का सोफा नहीं है।।

अस्थियां विसर्जित कर दी हैं तुमने
अपनी अन्तरात्माओं जी।
तभी तो चल रही हैं दुकानें,
पाखंड के इन आकाओं की।।

राम नाम का जाप करने वाले,
ये दिल से हैवान बन बैठे।
ऐ मेरे मालिक नहीं रही तेरी
ज़रूरत अब यहां।
इंसान खुद यहां भगवान बन बैठे।।

विनोद विद्रोही
नागपुर(7276969415)

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