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ये मत समझ तेरे किए से अंजान था...

ये मत समझ की तेरे किए से अंजान था, खामोश रहना दिल के जज्बातों का अरमान था॥ जिसे बड़ी आसानी से तोड़कर चले गये तुम, वो कुछ और नहीं, मेरे भरोसे का मकान था।। विनोद विद्रोही

वन्दे मातरम इसका नहीं कोई धर्म....

दुख सिर्फ़ इतना है, नहीं और कोई गुरेज है, अमन की इस फुलवारी में ये कांटों की सेज है।। लगता है कुछ लोगों के डीएनए में रह गये अंग्रेज हैं। तब ही तो उन्हें वन्दे मातरम, और मां भारती के जयकारे से परहेज़ है।। बेशक वन्दे मातरम गाना या ना गाना, एक निजी अधिकार है। वो बात अलग है इस देश के तुम बाशिन्दे हो, इस पर मुझे धिक्कार है।। विनोद विद्रोही

अपने लहू से सींचा है इस घाटी को...

लहू के एक-एक क़तरे से सींचा है, हमने कश्मीर की इस घाटी को। गर्दन धड़ से अलग कर देंगे, जो नापाक हाथ लगे इस माटी को।। अरे जड़ से उखाड़ फेंको पेड़ ये बबूलों के, ये परिणाम हैं देश के कुछ आला नेताओं के भूलों के।। विनोद विद्रोही

ये घाटी आज फ़िर वही जूनून मांग रही है...

इंसानियत चीख-चीख कर सुकून मांग रही है। कश्मीर की धरती है की रोज-रोज खून मांग रही है।। जिस वतनपरस्ती से आजाद कराया था ये मुल्क, ये घाटी आज फ़िर वही जूनून मांग रही है।। विनोद विद्रोही

जिसके समर्थन में खड़ें हो, वो बातें सब जहरीली हैं....

दिल पत्थर, हाथों में पत्थर, ये राहें भी पथरीली हैं, जिसके समर्थन में खड़ें हो, वो बातें सब जहरीली हैं।। अपने होकर भी घोंपा है खंजर तुमने पीठ में, सिर्फ इसीलिए आज आंखें गीली हैं।। विनोद विद्रोही

दुनिया दुश्मन बनी बैठी है जान की...

मत खरीदो अगर जरूरत ना हो कीमती सामान की, दुनिया दुश्मन बनी बैठी है जान की। सच कहूं, लोगों की नजरों में मैं चुभने लगा हूं, जब से बात की है ईमान की।। विनोद विद्रोही

बेशर्मी की इंतेहा देखो, फिर भी हम जिए जा रहे हैं...

बात में कोई दम नहीं फिर भी किए जा रहे हैं। आखिर कौन सा गम है जो इतनी पिए जा रहे हैं।। उनसे कहा था मत जाओ छोड़कर मर जाएंगे, बेशर्मी की इंतेहा देखो, फिर भी हम जिए जा रहे हैं।। विनोद विद्रोही