...तब जाकर दो जून की रोटी आती है।

यूं तो है अपनी पर कितना मुझे सताती है।
जिंदगी हर मोड़ पर आईना मुझे दिखाती है।
और मेरी मजबूरियां दिन भर कितनी जिल्लतें उठाती हैं।
तब जाकर कहीं घर में दो जून की रोटी आती है।।
विनोद विद्रोही

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