तुम तो अपने हो तो कैसे तुम पर अधिकार बदल लें। गर इतने ही व्यस्त हो तो आओ हम-तुम कारोबार बदल लें।। हम तो उनमें से नहीं जो वक्त के साथ यार बदल लें। तुम्हारी तुम जानो, भला हम कैसे अपना प्यार बदल लें।। विनोद विद्रोही
जवानों की शहादत पर कैसे चुप रहा जाऊं मैं, मैं दिल्ली नहीं सबकुछ जान के भी मौन हो जाऊं मैं। बनकर चट्टान दुश्मानों से मैं टकरा जाऊंगा, सीने पर जख्म देने वालों को मौत की नींद सुलाऊंगा। दे दो बंदूक अब मेरे हाथों में मैं जाऊंगा लड़ने को, भारत मां का मान बचाने मैं तैयार हूं मरने को। दिल्ली तेरे हाथों में वक्त चूंड़ियां पहनाएगा, तेरी कायरता पर इतिहास का सर शर्म से झुक जाएगा। सीमा पर खून बहे और दिल्ली तू मौन रहे, ऐसे में तू ही बता असली अपराधी कौन रहे। बुजदिलों के हाथ कांपते हैं कुछ भी करने को, भारत मां का मान बचाने मैं तैयार हूं मरने को। दुर्योधन तबाही मचा रहा कश्मीरी क्यारों में। कृष्ण की नीतियां फेल हो रही इन बारूदी बौछारों में। अर्जुन का गांडिव अचेत पड़ा है, लाशों के अम्बारों में, भीम बेचारा लाचार खड़ा है सीमा के गलियारों में। लेकिन समंदर को आंख दिखाते, समझा दो इन झरनों को, भारत मां का मान बचाने मैं तैयार हूं मरने को, दे दो बंदूक अब मेरे हाथों में मैं जाऊंगा लड़ने को। विनोद विद्रोही
26/11 बरसी: ************** आतंकी हमले की बरसी पर फिर कैंडल लेकर निकलेंगे। जवानों की शहादत पर आज फिर दिल हमारे पिघलेंगे। आज फिर उनके कसीदे पढ़ेंगे, यादों में उनकी झूल जायेंगे, और कल, कौन शहीद काहे की शहादत सब भूल जायेंगे।। जब तक देश इस परिपाठी पर चलता रहेगा, दर्द आतंक का मिला है और मिलता रहेगा। बाकी देश तो सम्भल चुके तुम भी अब सम्भलना सीखो। दुश्मन की छाती पे चढ़कर तुम भी मूंग दलना सीखो।। कथित मित्र अमरीका को कब तक मदद के लिये पुकारोगे। आखिर तुम कब घर में घुसकर हाफिज को मारोगे।। हम रोयें और आतंकी आजाद घूमें ये स्वीकार नहीं। जब तक देश के गुनहगार जिंदा हैं, हमें बरसी मनाने का अधिकार नहीं।। विनोद विद्रोही नागपुर
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