Posts

सियासत क्या बदली लोगों के ख्याल बदल गये...

सियासत क्या बदली लोगों के ख्याल बदल गये। ख्याल के साथ-साथ सवाल बदल गये। खैर अच्छा है, शायद यही वक्त का इंसाफ है। चलो पता तो चल गया देश की आस्तीनों में कितने सांप हैं।। विनोद विद्रोही

अभी तो सफर में हूं...

अभी तो सफ़र में हूं: ***************** अभी तो सफ़र में हूं, अभी कहां मेरे साथ ये ज़माना चलेगा। मंज़िल बहुत दूर है, अभी तो ठोकरें और ठुकराना चलेगा।। कर ना लेना बात तुम उनसे मिलने की, वर्ना वही व्यस्तता वाला का बहाना चलेगा। चूंकि हैसियत नहीं तुम्हारी आज दो कौड़ी की। तो मुमकिन है तुमपर ही हर निशाना चलेगा।। अभी-अभी तो दिल टूटता है, अभी कुछ दिन और नाम अपना दीवाना चलेगा। और ख़बर है की वो आये हैं, चलो..अब फ़िर उनकी गलियों में आना-जाना चलेगा।। नया नहीं तो क्या हुआ ले आओ, सौ का नोट है पुराना चलेगा। काहे तुम खोले जा रहे हो ये फिजूल की दुकानें। ये आशिकों की बस्ती है साहब, यहां मयखाना या पागलखाना चलेगा।। जाकर चहेरा ही तो दिखाना है आराम से जाओ, अभी तो मुर्दे को नहलाना-धुलाना चलेगा। ये जो भूख है विद्रोही बड़ी बेशर्म होती है। ताजा कहां मांग रहा हूं, पेट भरने के लिये बासी खाना चलेगा।। विनोद विद्रोही

ना पाओगे कलम विद्रोही की चरण-चुम्बन की भाषा में...

सत्ता के ठेकेदारों अपनी खैर मनाओ, गर मिली है कुर्सी तो कुछ कर के दिखाओ। ना रहना कभी किसी प्रलोभन या किसी आशा में । कभी ना पाओगे कलम विद्रोही की चरण -चुम्बन की भाषा में।। विनोद विद्रोही

तलवारें चीर देतीं, सुइयां सिलाई करती हैं...

बल का गुमान हुआ हाथियों को, तो चींटियां चढ़ाई करती हैं। तलवारें तो चीर देतीं, सुइयां सिलाई करती हैं।। विनोद विद्रोही

मैं भी लिख सकता हूं गीत प्रेम के...

यूं तो मैं भी लिख सकता हूं गीत प्रेम के, पर लिखूंगा नहीं। सबब क्या है इसका, ये भी किसी से कहूंगा नहीं।। विनोद विद्रोही

लड़ते आये हो, यूं ही लड़ते रहोगे...

जब तक बिके हुये चैनलों और अखबारों को पढ़ते रहोगे। लड़ते आये हो और यूं ही सदा  लड़ते रहोगे।। क्या रखा है झगड़े वाली इन बातों में। सरकारें आती-जाती रहती हैं, ये सोचो क्या बदलाव आया तुम्हारे हालातों में।। सरकारों का काम आवामों में, नफ़रतों के बीज बोना होता है। कोई मसीहा नहीं यहां विद्रोही, सबको अपना बोझ खुद ही ढोना होता है।। विनोद विद्रोही

जब देखता हूं भीख मांगते बच्चों को चौराहों पर...

उम्र बचपन की, बोझ पचपन का: ************************** जब-जब देखता हूं भीख मांगते बच्चों को चौराहों पर। शर्मिंदा हो उठता हूं देश की व्यवस्थाओं पर।। किसी बेबस बाग के ये, मुरझाये हुये फूल हैं। बचपन क्या होता है, गये ये भूल हैं। कभी इस तो कभी उस गाड़ी के, पीछे दौड़ लगाते हैं। बेचारे पेट की खातिर कहां-कहां, हाथ फैलाते हैं। कभी इसकी दुत्कार, तो कभी उसकी फटकार सुनकर इनके सुध-बुध खो जाते हैं। क्या फुटपाथ, क्या कचरे का ढेर जहां जगह मिली ये बच्चे सो जाते हैं। ज़िंदगी ने जो सबक इन्हें सिखाया है। कोई किताब, किसी स्कूल ने कहां ये पढ़ाया है। कैसे कह दूं ये बच्चे देश का कल हैं। हकीकत तो ये है, दो जून का निवाला भी पाने में ये विफल हैं।। कागजों पर जगमगाती दुनिया के पीछे का ये अंधेरा सूनसान हैं। इनकी भी फिक्र करो साहब, ये भी तो हिंदुस्तान हैं।। विनोद विद्रोही