तुम्हारे इंतज़ार में कंकाल हो गये...

तुम कपूतों के लिये जो,
जी का जंजाल हो गये।
वही तुम्हारी राह तकते-तकते,
कंकाल हो गये।।
विनोद विद्रोही

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